Wednesday, 18 July 2018

आनंद (राजेश खन्ना) मरते नहीं!


- मनोज कुलकर्णी

अपनी अमर भूमिका 'आनंद' (१९७१) के "ज़िन्दगी कैसी हैं पहेली.." गाने में  राजेश खन्ना!

"बाबूमोशाय..."

आज सुबह होते ही मेरे कान में गुंजा..और काका की याद आयी!
'अंदाज़' के "ज़िन्दगी एक सफर.." गाने में राजेश खन्ना और हेमा मालिनी.

भारतीय सिनेमा का पहला सूपरस्टार.. जतीन खन्ना उर्फ़ राजेश खन्नासाहब का आज ६ वा स्मृतिदिन!

"ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना.." ऐसा वाकई में हसीनाओं के दिल में बसे इस रूमानी कलाकार का 'अंदाज़' था!

स्टारडम पर पूरी हुक़ूमत पाते हुए उसने 'बॉबी' (डिंपल) को जवां दिलों से चुराया!
शादी के वक्त डिंपल कपाडिया और राजेश खन्ना!
लेकिन साथ में दूरियाँ आती गयी.. "ज़िन्दगी के सफर में गुज़र जाते है जो मक़ाम.." इसका अहसास उसे दुखी करता गया!..और वह "करवटे बदलते रहें सारी रात हम 'आप की कसम'.." ऐसा उसे याद करता रहा!

बाद में अपना "नदिया चले चले रे धारा तुझको चलना होगा.." सुनकर वह काम में मसरूफ़ रहने लगा!
'सफ़र' (१९७०) के "नदिया चले चले." गाने में शर्मिला टैगोर और राजेश खन्ना.



ऐसे 'आनंद' रहने की कोशिश में "ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाये.." इस सोच ने उसे घेर लिया!
'आप की कसम' (१९७४) के "ज़िन्दगी के सफर में.. " गाने में राजेश खन्ना!

फिर सेहत भी साथ छोड़ने लगी..तब इस 'सफर' का आखरी पड़ाव उसे दिखने लगा..लेकिन इस ज़िंदादिल शक़्स ने उसे ऐसा अपनाया..


"ज़िन्दगी को बहोत प्यार हमने किया
मौत से भी मोहब्बत निभाएंगे हम..!"

काका, आपको हम कभी नहीं भूलेंगे!!

मेरी यह सुमनांजली!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]
मशहूर फ़िल्मकार..प्रकाश मेहरा!

जादू खोया 'जादूगर' और उभरता सूरज!


 - मनोज कुलकर्णी

'मुकद्दर का सिकंदर' (१९७८) में अमिताभ बच्च, रेखा और अमजद खान.

हालही में बॉलीवूडके मशहूर निर्माता-निर्देशक प्रकाश मेहरा जी का जन्मदिन था..तब पहली हिट फिल्म 'हसीना मान जाएगी' (१९६८) से शुरू हुआ उनका सफर याद आया!.. इसमें बाद में अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार बनानेवाली उनकी फिल्म 'जंजीर' (१९७३) से छाया हुआ इन दोनोंका निर्देशक-अभिनेता साथ का जादू ..जो 'हेरा फेरी' (१९७६), 'मुकद्दर का सिकंदर' (१९७८), 'लावारिस' (१९८१), 'नमक हलाल' (१९८२) और 'शराबी' (१९८४) तक कुछ हद बरक़रार रहा..लेकिन 'जादूगर' (१९८९) में वह दिखाई नहीं दिया..इस की शूटिंग मैंने देखी थी और मेहरासाहब को मिला था!

'राजश्री प्रोडक्शन' के निर्देशक सूरज बरजात्या!
तब बम्बई में नजदीक रहे 'सेठ' और 'नटराज' स्टूडिओ में एक जगह 'जादूगर' की और दूसरी जगह सूरज बरजात्या की शुरूआती 'मैंने प्यार किया' (१९८९) की शूटिंग हो रही थी..जिसको कोई इतनी एहमियत नहीं दे रहे थे! लेकिन मैं 'जादूगर' का सेट छोड़ कर 'मैंने प्यार किया' की शूटिंग देखने और इंटरव्यू करने गया...तब नया आया सलमान खान और उस फिल्म से परदेपर आ रही षोडश, खूबसूरत भाग्यश्री पटवर्धन इनपर ''मेरे रंग में रंगनेवाली.." गाना बेहतरीन तरीकेसे चित्रित हो रहा था! इन दौरान तब नए रहें उन निर्देशक-कलाकारों से बात हुई..तब लक्ष्मीकांत बेर्डे भी वहां आया और ''राजकमल' में भी मेरी नई फिल्म की शूटिंग देखने आओ'' बोला!
'मैंने प्यार किया' (१९८९) में भाग्यश्री पटवर्धन और सलमान खान.


खैर तो तब आम बम्बैय्या बात करनेवाला सलमान, शर्मिली भाग्यश्री और कॉन्फिडेंट सूरज बरजात्या से हुई मुलाकातें यादगार रहीं..बाद में तो 'मैंने प्यार किया' हिट साबीत हुई और सलमान-भाग्यश्री स्टार हुए! इसके बाद निर्देशक सूरज बरजात्या और अभिनेता सलमान खान का साथ..'हम आपके है कौन' (१९९४), 'हम साथ साथ है' (१९९९) और 'प्रेम रतन धन पायो' (२०१५) जैसी हिट फिल्में देकर अछा खासा सफल चल रहा है!

याने की एक ही साल १९८९ में..एक ओर प्रख्यात निर्देशक-सुपरस्टार का परदे पर का जादू चला गया! और..दूसरी ओर नए निर्देशक-स्टार का सूरज उभर आया!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Friday, 13 July 2018

धुव्वाधार बारीश में कोई परेशान हो सो हो..लेकिन उसमें भी पानी से मस्ती का मजा लेनेवाला अल्हड़पन सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं हैं! हसीन जवाँ भी इसमें अपने अंदाज़ में इश्क़ का रंग खेलते हैं!

ऐसा ही यह रूमानी दृश्य हैं 'हमजोली' (१९७०) के "हाय रे हाय.." गाने का..जिसमें मासूम ख़ूबसूरत लीना चंदावरकर और जंपिंग जैक जितेंद्र बारीश में इश्क़ का लुत्फ़ उठा रहें हैं!

कॉलेज लाइफ की कुछ रूमानी यादें इससे जुड़ीं हैं!!

- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी', पुणे]

विशेष लेख:


'आवारा' से 'संजु'...गुमराह 'रईस' सिनेमा!



- मनोज कुलकर्णी



हिट हो रही 'संजु' फिल्म में संजय दत्त की भूमिका बखूबी निभानेवाले रणबीर कपूर!



फिल्म 'रईस' में शाहरुख़ खान!
"कोई धंदा छोटा नहीं होता..!"

इस साल आयी फिल्म 'रईस' में शाहरुख़ खान का..गलत धंदा करनेवाला किरदार..जो वास्तव में एक गुनहगार पर आधारित था..यह जोश से कहता हैं।.. देखकर बड़ा खेद हुआ और मुश्किल से पूरी फिल्म देख पाया।

राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त 'परज़ानिया' (२००५) जैसी समकालिन वास्तवदर्शी फिल्म बनानेवाले राहुल ढोलकिया ने 'रईस' जैसी बाजारू फिल्म का निर्देशन करना..और शाहरुख़ जैसे अच्छे कलाकार ने इसमें ऐसा किरदार निभाना यह कतई गवारा नहीं हुआ!..'यह क्रिमिनल को ग्लोरिफ़ाई करना तो नहीं' ऐसे सवाल समाजमन में उठना लाज़मी था!

फिल्म 'आवारा' (१९५१) में राज कपूर और नर्गिस!

आज हिट हो रही 'संजु' फिल्म से उठे "बिगड़ी ज़िन्दगी को क्यों दिखाना" ऐसे बवाल ने इस पर प्रकाश डालना जरुरी हो गया। हालांकि मैंने अभी तक यह फिल्म देखी नहीं है और 'खलनायक' (१९९३) फेम संजय दत्त की जीवन पर कोई टिपण्णी भी करना नहीं चाहता। लेकिन ऐसी फिल्मों की चली आ रही फिल्मों की परंपरा पर यहाँ लिख रहां हूँ...

फिल्म 'काला बाजार' (१९६०) में देव आनंद!
१९५१ में आयी 'आर के' की फिल्म 'आवारा' ने तब अच्छे परिवार के बिगड़े बेटे का किरदार परदे पर लाया..जिसे लिखा था के. ए. अब्बास जी ने। इस फिल्म से पहली बार अपनी 'चार्ली ट्रैम्प इमेज' में परदे पर आए राज कपूर ने दरअसल वह बुरी ज़िंदगी में उलझा किरदार निभाया था..जो बाद में नर्गिस के प्यार से सुधरना चाहता हैं! इसके मशहूर स्वप्नदृश्य-गान में आख़िर में आकाश से उतरती अप्सरा रूप में नर्गिस के पैरों पर गिड़गिड़ाता राज कपूर चिल्लाता हैं "ये नहीं हैं..ये नहीं हैं ज़िन्दगी..मुझको चाहीए बहार.."

 इसके बाद १९६० में 'नवकेतन' की गोल्डी (विजय आनंद) ने निर्देशित की हुई फिल्म 'काला बाजार' में..पिक्चर्स की टिकटों का काला बाजार करनेवाले राह भटके आदमी का किरदार देव आनंद ने किया था..जो वहिदा रहमान की रूप से उसकी ज़िन्दगी में प्यार आने के बाद बदलने की कोशिश करता हैं!
'हॉलीवुड' की फिल्म 'गॉडफादर' (१९७२) का पोस्टर!

वैसे अमरीकन या कहा जाए तो 'हॉलीवुड' की कमर्शियल फार्मूला फिल्में गुनहगारी विश्व को पहले उजागर करने लगी..उनकी शुरुआत की 'द ग्रेट ट्रेन रॉबरी' (१९०३) से! बाद में मारिओ पूजो की कादंबरी पर मशहूर फ़िल्मकार फ्रांसिस फोर्ड कोप्पोला ने बनायी 'गॉडफादर' (१९७२) में क्रिमिनल फॅमिली द्वारा पुरे माफिया जगत को परदे पर दर्शाया! इस माइलस्टोन फिल्म में मंजे हुए अभिनेता मार्लोन ब्रांडो और अल पचिनो नें ऐसे किरदार निभाएं!

उस हिट फिल्म 'गॉडफादर' से प्रेरित हो कर फ़िरोज़ खान ने १९७५ में 'धर्मात्मा' यह बॉलीवुड फिल्म बनायी..जिसमें उसने और प्रेमनाथ नें वह किरदार बखूबी निभाएं! इसी साल अपने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्म 'दीवार'आयी..जानेमाने फ़िल्मकार यश चोपड़ा की यह अलग जॉनर की फिल्म थी। ऐसा कहा गया की यह किरदार बम्बई के उस वक्त के डॉन पर आधारित था! हालांकि दो अलग रास्तें चुने भाइयों के बीच खड़ी माँ और परिवार पर हुए अत्याचार का बदला लेने वाला 'एंग्री यंग मैन' ही इसमें दिखायी दिया!
मराठी फिल्म 'माफीचा साक्षीदार' (१९८६).

हिंदी फिल्मों के अलावा प्रादेशिक फिल्मों में भी कुछ गुनहगार किरदार नजर आएं। इसमें पहली थी..सत्य घटना पर आधारित मराठी 'माफीचा साक्षीदार' (१९८६)..इसमें पुणे में हुए हत्याकांड के दोषिओं को किरदार बनाये गएँ थे और प्रमुख भूमिका की थी..नाना पाटेकर ने! प्रदर्शन पूर्व सेंसोर बोर्ड और माध्यमों के अनेक सवालों में यह फिल्म घेरी रहीं। इसके बाद आयी मणि रत्नम की तमिल फिल्म 'नायकन' (१९८७) भी एक माफिया के जीवन पर थी और इसमें दाक्षिणात्य मंजे हुए अभिनेता कमल हसन ने वह किरदार निभाया था!
तमिल फिल्म 'नायकन' (१९८७).

उस 'नायकन' पर फिरोज खान ने हिंदी में 'दयावान' (१९८८) फिल्म बनायी.. जिसमे विनोद खन्ना ने वह किरदार उसी ढंग में निभाया! बाद में आयी राम गोपाल वर्मा की फिल्म 'कंपनी' (२००२) तो बम्बई के अंडरवर्ल्ड वॉर को ही उजागर कर गयी..जिसमें अजय देवगन और विवेक ओबेरॉय ने वह किरदार निभाएं थे। फिर बॉलीवुड में ऐसी 'गैंगस्टर' फ़िल्में लगातार आती रहीं हैं!
'कंपनी' (२००२) से बॉलीवुड में 'गैंगस्टर' फ़िल्में!

दुनिया का काला सच या कहाँ जाए तो बुरे लोगों के काले धंदे और गुनाह परदे पर दिखाना..इसका उद्देश उस वास्तव से समाज को वाकिफ करना और जानकारी देकर सावध करना हो तो ठीक हैं; लेकिन ऐसे बिगड़े, बुरे कर्म करनेवालों को सिनेमा के जरिये उजागर करके पैसे कमाना सरासर गलत हैं। (यह किसी पर व्यक्तिगत टिपण्णी नहीं)..आखिर फिल्मकारों का समाज के प्रति कुछ तो दायित्व हैं और समाज की जिम्मेदारी भी हैं। इसलिए सिनेमा इस प्रभावी माध्यम को सोच-समझ कर हैंडल करना चाहिएं!

- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी', पुणे]

Monday, 9 July 2018

समर्थ बहुमुखी अभिनेता..संजीव कुमार!


"तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई.शिकवा तो नहीं..
तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन ज़िन्दगी तो नहीं."

'आँधी' (१९७५) में सुचित्रा सेन और संजीव कुमार!
'आँधी' (१९७५) फ़िल्म का यह गाना गुलज़ार-पंचम (संगीतकार आर. डी. बर्मन) के संगीत रजनी में गाया जा रहा था..तब इसके रचईता गुलज़ार साहब स्टेज पर आये और उन्होंने यह गाना परदे पर साकार किये संजीव कुमार तथा सुचित्रा सेन को याद करके उपर देखते हुए कहाँ "हरीभाई (संजीव कुमार) ये गीत तुम्हारे लिए है!

संजीव कुमार और गुलज़ार!

भूमिका परदे पर जीनेवाले संजीव कुमारजी ने गुलजारजी की 'कोशिश', 'परिचय', 'मौसम' और 'अंगूर' जैसी फिल्मों में खूब अभिनय किया था!


आज इस बहुमुखी अभिनेता..संजीव कुमारजी का ८० वा जनमदिन है! इस वक़्त मुझे याद आ रहा है बहोत साल पहले पुणे में उनका हुआ और मैंने आँखों देखा सम्मान!


उन्हें मेरी यह सुमनांजली!!


- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी, पुणे]

Monday, 2 July 2018

"ठंडी हवा, काली घटा..
आ ही गयी झूम के..
प्यार लिये डोले हँसी..

नाचे जिया घूम के..."

ऐसे मौसम में यह रूमानी गाना और उसपर हसीन मधुबाला की खिल उठी छवि याद आती हैं..और दिल उस अंदाज़ में आशिक़ाना हो जाता हैं!

मजरूह सुल्तानपुरी जी ने लिखें इस गीत को ओ.पी. नय्यर जी के संगीत में गीता दत्त जी ने गुरुदत्त जी की फिल्म 'मिस्टर एंड मिसेस ५५' के लिए बखूबी गाया था!

- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी, पुणे]

Sunday, 1 July 2018

फ़िल्म लेखक-निर्देशक अब्रार अल्वीजी!

मशहूर फ़िल्म लेखक अब्रार अल्वी!


- मनोज कुलकर्णी


महान फ़िल्मकार गुरुदत्तजी और फ़िल्म लेखक अब्रार अल्वीजी!







मशहूर फ़िल्म लेखक तथा निर्देशक अब्रार अल्वी जी का आज ९१ वा जनमदिन! उन्होंने महान फ़िल्मकार गुरुदत्तजी की काफी फ़िल्में लिखीं!..उनमें से दो फिल्मों के कुछ ख़ास संवाद यहाँ याद किए हैं..
'मिस्टर एंड मिसेस ५५' में गुरुदत्त, मधुबाला और ललिता पवार!


'गुरुदत्त फिल्म्स' की 'मिस्टर एंड मिसेस ५५' का संवाद कुछ इस तरह..

मधुबाला की गार्डियन ललिता पवार गुरुदत्त को पूछती है "आर यू कम्युनिस्ट?"
उस पर गुरुदत्त कहेता है "नो, आय एम् कार्टूनिस्ट!"

उसी फिल्म का दूसरा प्रसंग और संवाद कुछ इस तरह..
गरीबों को रोटी मिलना कितना मुश्किल है यह गुरुदत्त खूबसूरत अमीर मधुबाला को समझाता है..उस पर वह कहती है "रोटी नहीं तो ब्रेड खा लेते!"
'साहिब बीबी और ग़ुलाम' में रहेमान, मीना कुमारी, वहिदा रहेमान और गुरुदत्त!

'गुरुदत्त फिल्म्स' की दूसरी फिल्म 'साहिब बीबी और ग़ुलाम' (१९६२) का संवाद कुछ इस तरह..

मीना कुमारी शोहर रहेमान को कहेती है "इन चार दीवारों में मेरा दम घुटता है..मैं क्या करू?"
उस पर रहेमान कहेता है "वही जो भाभी करती है..गहने बनवाओ और गहने तुडवाओ!"

गुरुदत्तजी की फिल्मों के ऐसे कई सूचक प्रसंग और संवाद मुझे याद है..जो लिखे थे अब्रार अल्वीजी ने!


अब्रार साहब को मेरा सलाम!!

- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी', पुणे]

Saturday, 30 June 2018

समकालिन सामाजिक स्थिती पर उपहासात्मक चित्रभाष्य करनेवाले जानेमाने फ़िल्मकार सईद अख़्तर मिर्ज़ाजी को ७५ वी सालगिरह की मुबारक़बाद!


मेरी पसंदीदा उनकी फ़िल्म 'नसीम' (१९९५) का क़ैफ़ीसाहब का संवाद अब भी याद है..
"नसीम तू हो ना सीम!"


-  मनोज कुलकर्णी
  ['चित्रसृष्टी', पुणे]

Wednesday, 27 June 2018

'मंज़िल' (१९७९) में उस गाने के दृश्य में मौशमी चटर्जी और अमिताभ बच्चन!
"रिमझिम गिरे सावन..
सुलग सुलग जाये मन.."

बरसात के दिनों में जब भी बम्बई में होता हूँ, तो सिर्फ पंचमदा के इस मेरे पसंदीदा गाने का लुत्फ़ उठाने के लिए..यह जहाँ फ़िल्माया गया उस कोलाबा..नरिमन पॉइंट की चक्कर काट ही लेता हूँ..फिर मन में यह गाना होता है और कुछ रूमानी यादें!
मशहूर संगीतकार राहुल देव बर्मन!

'मंज़िल' (१९७९) इस बासु चटर्जी की फ़िल्म के लिए योगेशजी ने यह गाना लिखा था..और किशोर कुमार तथा लता मंगेशकरजी ने यह उसी अंदाज़ में गाया था! परदेपर धुँवाधार बारीश में यह अमिताभ बच्चन और मौशमी चटर्जी ने रूमानी जोश से पेश किया था!

आज संगीत के इस अवलिया पंचमदा (आर. डी. बर्मन) के जनमदिन पर यही गाना मन में गुँजा..क्योंकि बारीश भी है और दिल रूमानी भी है!

उन्हें यह सुमनांजली!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी, पुणे]

Thursday, 10 May 2018

"मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता.."

कह कर यह जहाँ छोड़ गए शायर कैफ़ी आज़मी साहब को उनके स्मृतिदिन पर सलाम!

 
- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]


Wednesday, 9 May 2018

विशेष लेख:


मख़मली कोमल आवाज़ के..तलत महमूद!


- मनोज कुलकर्णी



"दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या हैं..
आखिर इस दर्द की दवां क्या हैं..?"
'मिर्ज़ा ग़ालिब' (१९५४) में "दिल-ए-नादाँ." पेश किया भारत भूषण और सुरैय्याने!
'मिर्ज़ा ग़ालिब' (१९५४) इस राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त फ़िल्म के लिए उनकीही रूमानी शायरी (सुरैय्या के साथ) गाकर मोहब्बत का दर्द बख़ूबी बयां किया था..तलत महमूद जी ने!..जब भी मैं यह सुनता हूँ प्यार भरा दिल उस शायराना माहौल में पहूँच जाता है!

आज तलत साहब का २० वा स्मृतिदिन! याद आ रहीं है लखनवी अदब के इस शानदार शख़्सियत से बहोत साल पहले उनके एक संगीत जलसे के दौरान हुई मेरी मुलाकात!
नौजवान गायक तलत महमूद.

शास्त्रीय संगीत का बाक़ायदा प्रशिक्षण लेकर महज १६ साल की उम्र में तलत ने दाग देहलवी, मिर, जिगर ऐसे मँजे हुए शायरों के कलाम 'ऑल इंडिया रेडिओ', लखनऊ पर गाना शुरू किया! उस कोमल रेशमी आवाज़ को पहचानते हुए 'एच.एम्.व्ही.' ने १९४१ में उसकी डिस्क बनायी!

उस्ताद बरक़त अली खां साहब और कुंदनलाल सैगल के उस दौर में..ग़ज़ल को अपनी पहचान बनाने तलत कलकत्ता आए। कुछ काल उन्होंने 'न्यू थिएटर' के संगीत क्षेत्र में काम भी किया! १९४४ के दरमियाँ उन्होंने वहां कमल दासगुप्ता के संगीत निर्देशन में गायी फ़ैयाज़ हाश्मी की "तसवीर तेरी दिल मेरा बेहेला न सकेगी.." ग़ज़ल मशहूर हो गयी! उसी दौरान उन्होंने कुछ बांग्ला गाने भी गाए और अच्छी सूरत होने के कारन परदे पर भी आए..इसमें 'राजलक्ष्मी' (१९४५) और 'तुम और मैं' (१९४७) इन फिल्मों में ख़ूबसूरत काननबाला के नायक भी बने!
गायक तलत महमूद और संगीतकार अनिल बिस्वास.


१९४९ में तलत बम्बई आए..तब संगीतकार अनिल बिस्वास ने उनके हुनर को परखा..और शाहीद लतीफ़ की फ़िल्म 'आरज़ू' के लिए "ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल.." यह मज़रूह सुल्तानपुरी का लिखा गाना उनसे गवाया.. जो मँजे हुए अदाकार दिलीपकुमार पर फ़िल्माया गया! अभिजात अभिनय और पार्श्वगायन का यह अनोखा संयोग दर्शकों को बहोत भाया! इसके सफलता के बाद १९५० का पूरा दशक जैसे तलत की मखमली आवाज़ से छाया रहा!..सज्जाद हुसैन, नौशाद, सी. रामचंद्र, मदनमोहन और सचिन देब बर्मन जैसे जानेमाने संगीतकारों ने उनसे गाने गवाएं!
वारीस' (१९५४) फ़िल्म के "राहीं मतवाले.." गाने में  
गायक-कलाकार तलत महमूद और सुरैय्या!


पार्श्वगायन के क्षेत्र में सफलता हासिल करते हुए तलत में अभिनेता बनने की ललक भी प्रबल थी और सैगल की तरह वह गायक-अभिनेता बनना चाहते थे! उनकी इस चाह से १९५३ में कारदार की 'दिल-ए-नादान' फ़िल्म में श्यामा के वह नायक बने..और बाद में एक सुरेला संगम रूपहले परदे पर आया फिल्म 'वारीस' (१९५४) से, जिसमे ख़ूबसूरत गायिका-अभिनेत्री सुरैय्या के वह नायक हुए..इसमें "राहीं मतवाले तू छेड़ एक बार मन का सितार.." इस रूमानी गाने में यह सुरेली साथ दर्शकों को भायी! बाद में वह बड़ी अभिनेत्रियों के भी नायक बने जैसे 'एक गांव की कहानी' (१९५७) में माला सिन्हा के! लेकिन साधारण रही इन फिल्मों के सिर्फ गाने लोकप्रिय हुए..मिसाल की तौर पर 'सोने की चिड़ियाँ' (१९५८) में नायिका नूतन ने उनके साथ ख़ूबसूरती से पेश किया "सच बता तू मुझ पे फ़िदा.."

'सोने की चिड़ियाँ' (१९५८) फ़िल्म के "सच बता तू मुझ पे फ़िदा.."
  गाने में गायक-अभिनेता तलत महमूद और नूतन! 


मख़मली आवाज़ के तलत सही मायने में आधुनिक सेमि-क्लासिकल और नॉन-क्लासिकल (फ़िल्मी) ग़ज़ल के निर्माता थे! यह सुने..एक तरफ हैं "मै दिल हूँ एक अरमाँ भरा.." ('अनहोनी'/१९५२), "शाम-ए-ग़म की कसम.." ('फुटपाथ'/१९५३), "जलते है जिसके लिए.." ('सुजाता'/१९५९) और "मै तेरी नज़र का सुरूर हूँ.." ('जहाँ आरा'/१९६४); तो दूसरी तरफ हैं "अंधे जहाँ के अंधे रास्तें.." (;पतिता'/१९५३), "बेचैन नज़र बेताब जिग़र.." ('यास्मिन'/१९५५), "अहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिए.." ('उसने कहाँ था'/१९६०) और "इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा.." ('छाया'/१९६१).
श्रेष्ठ कलाकार..अभिनेता दिलीप कुमार और गायक-अभिनेता तलत महमूद!

संगीत के बदलते दौर में वाद्यों के आवाज़ तलत जी जैसे अभिजात गायकों की प्रतिभा पर हावी हो गए!..१९९२ में उन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया।..और १९९८ में वह जहाँ छोड़ कर चले गए!

तलत साहब ने गाया था..
"मेरी याद में तुम ना आसूँ बहाना.." 
लेकिन हम उन्हीं के गीत से कहते हैं..
"तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं अभी."

उन्हे मेरी सुमनांजली!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]
















Saturday, 5 May 2018

 
"शम्मा रह जाएगी...
परवाना चला जायेगा.."


मौसिकी के शहेनशाह नौशाद साहब का आज १२ वा स्मृतिदिन!


उनसे हुई मुलाक़ात की 'अनमोल घड़ी' याद आ रहीं हैं..!

उन्हें सलाम!!


- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी', पुणे]





< नौशाद साहब के संगीत में.. 
   गाते मोहम्मद रफ़ी साहब!

Friday, 4 May 2018


एक्सक्लूजिव्ह!


भारतीय सिनेमा के उन प्रवर्तकों को न भूलें!


- मनोज कुलकर्णी

दादासाहब फालके जी ने बनायी भारतीय फ़ीचर फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (१९१३) का महत्वपूर्ण दृश्य!

१०५ साल हो गए उस ऐतिहासिक घटना को..३ मई, १९१३ को दादासाहब फालके जी ने बनायी पहली भारतीय फ़ीचर फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र' आम जनता के लिए बम्बई के 'कोरोनेशन सिनेमा' में प्रदर्शित हुई थी! लेकिन इससे पहले भी भारत में फ़िल्म बनाने की सफल-असफल कोशिशें हुई!
१८९४-९५ के दरमियाँन होनेवाला 'शाम्ब्रिक  खारोलिका '.. 'मैजिक लैंटर्न शो'! 

'शाम्ब्रिक खारोलिका '(मैजिक लैंटर्न'). 












सबसे पहले १८९४-९५ के दरमियाँन 'शाम्ब्रिक खारोलिका '(मैजिक लैंटर्न') नाम का इस सदृश चलचित्र का आभास दिलाने वाला खेल कल्याण के महादेव गोपाल पटवर्धन और उनके पुत्रो ने शुरू किया था।
हरिश्चन्द्र भाटवडेकर तथा सावे दादा!


फिर १८९६ में 'लुमीए शो' से प्रेरणा लेकर बम्बई में मूल रूप से छायाचित्रकार रहे हरिश्चन्द्र सखाराम भाटवडेकर तथा सावे दादा ने 'दी रेस्लर्स ' और 'मैन एंड मंकी ' जैसे लघुपट १८९९ में बनाएं। किसी भारतीय ने चित्रपट निर्मिती करने का वह पहला प्रयास था!
'रॉयल बॉयोस्कोप' के हीरालाल सेन और उन्होंने बनायी डॉक्यूमेंटरी 'स्वदेशी मूवमेंट'!


इसके बाद कोलकत्ता में 'रॉयल बॉयोस्कोप' के हीरालाल सेन और उनके बन्धुओने कुछ बंगाली नाटक और नृत्य के दृश्य चित्रित करके फ़रवरी, १९०१ के दरमियाँन वह परदे पर दिखाएं! 


आगे १९०५ तक कोलकत्ता में जे. एफ. मदान इन्होने इस तरहकी चित्रनिर्मिती शुरू की! नाटयसृष्टी से आए हुए मदान ने 'ग्रेट बंगाल पार्टीशन मूवमेंट' जैसे लघुपट निर्माण किएं। इन्हे वो 'स्वदेशी ' कहा करते थे!

जे. एफ. मदान.
इसके बाद ऐसा प्रयास करने वाली व्यक्ति थी श्रीनाथ पाटनकर..उन्होंने १९१२ में 'सावित्री' यह कथा चित्रपट किया तो था...लेकिन उसके निर्मिती प्रक्रिया (प्रोसेसिंग) में समस्याए पैदा हुई और उसकी प्रिंट पूरी तरह से ब्लेंक आ गयी!

१९१२ में ही रामचन्द्र गोपाल तथा दादासाहेब तोरने...इन्होने 'पुंडलिक' यह अपना कथा चित्रपट सफलतासे पूरा किया!...लेकिन वह भारत का पहला कथा चित्रपट नहीं माना गया। इसकी वजहें नमूद की गयी की..वह नाटक का चित्रीकरण था, उसके लिए विदेसी छायाचित्रकार का सहयोग लिया गया..और इसकी प्रक्रिया लन्दन में करायी गयी!..हालांकि इसकी प्रिंट भी उपलब्ध नहीं!
दादासाहेब तोरने और १९१२ में प्रदर्शित उनकी फिल्म 'पुंडलिक' की जाहिरात!

इसी दौरान नाशिक के दादासाहब फालके ने फ़िल्म निर्माण का जैसे ध्यास लिया, जिसे उनकी पत्नि ने भी सक्रिय साथ दिया!..और 'बीज से उगता पौदा' इस लघुपट से शुरू करके १९१३ में 'राजा हरिश्चन्द्र' यह भारत का पहला कथा चित्रपट तैयार करने तक उन्होंने बडा यश संपादन किया! इसका अब बड़ी फिल्म इंडस्ट्री के रूप में वृक्ष हुआ हैं!
पत्नि सरस्वतीबाई के साथ उम्र के आखरी पड़ाव में दादासाहब फालके!
लेकिन मेरा कहना है की भारत में छोटी फिल्म से यह मीडियम लाने का काम (भाटवडेकर) सावे दादा जी ने पहले किया...फिर हीरालाल सेन और मदान इन्होनें कुछ लघुपट (नॉन फ़ीचर कह सकते हैं) बनाकर इसमें अपना योगदान दिया!.और दादासाहब फालके ने पहला कथा चित्रपट (फ़ीचर फ़िल्म) तैय्यार किया!..तो इन सब हस्तियों को भारतीय सिनेमा के जनक में शामिल करना चाहिएं!



भारतीय सिनेमा के इन प्रवर्तकों को मानवंदना!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Monday, 30 April 2018

आज़ हमारे 'भारतीय सिनेमा के पितामह' दादासाहब फालके जी का जनमदिन!

उन्होंने १९१३ में 'राजा हरिश्चन्द्र' यह पहली भारतीय फिचर फिल्म बनायी! जिसे अब १०५ साल हो गएं है!
 

उन्हें  सलाम!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]