Tuesday, 14 August 2018


लहराओं तिरंगा प्यारा..!!

हमारें भारत के स्वतंत्रता दिन की शुभकामनाएं!

- मनोज कुलकर्णी

Monday, 13 August 2018

विशेष लेख:

आया सावन झुमके!


- मनोज कुलकर्णी


"आया सावन झूम के" (१९६९) गाने में धर्मेंद्र और आशा पारेख.
"बदरा छाए कि
झूले पड़ गए हाय
कि मेले लग गए
मच गई धूम रे.."

'आया सावन झूम के' (१९६९) फ़िल्म का आनंद बक्षी का यह गाना हर साल दस्तक़ देता है सावन महिना आने की..जिसकी रंगीन गतिविधियाँ इसमें समायी हुई हैं!..धर्मेंद्र, आशा पारेख और साथियों ने बारीश का पूरा लुत्फ़ उठातें हुए इसे साकार किया हैं!
'परख' (१९६०) के "ओ सजना बरख़ा बहार आयी.." गाने मे साधना.


बरसात की बूँदों सें खिलीखिली हरियाली और फुलों के साथ रूमानी दिल भी खिल उठतें हैं इन दिनों में! यह चित्र हमारे सिनेमा के कई प्रसंग एवं गानों में प्रतिबिंबित हुआ हैं!

'मि. एंड मिसेस ५५' में छाता लेकर गाती हसती 'ब्यूटी क्वीन' मधुबाला!
हालांकि इस में बारीश आने की सबसे ख़ुशी किसानों को होती हैं..जिसे भावुकतासे दिखाया हैं बिमल रॉय की फिल्म 'दो भीगा ज़मीन' (१९५५) में..जिसमे किसान बने बलराज साहनी खेतों में काम कर रहें किसानों को कह जाता है "धरती कहे पुकार के..बीज बिछाले प्यार के.." तो बिमलदा की ही फिल्म 'परख' (१९६०) मे गाँव की मासूम लड़की बनी साधना अपने साधारण घर की छत से गिरता बारीश का पानी देखते हुए गाती हैं "ओ सजना बरख़ा बहार आयी.."

'काला बाज़ार' (१९६०) के "रिमझिम के तरानें लेके आयी बरसात" में वहिदा रहमान और देव आनंद.
इसमें 'बरसात' फेम 'आर.के.' का फिल्म 'श्री ४२०' (१९५५) का मशहूर छाता गीत "प्यार हुआ इक़रार हुआ हैं.." और उसमे राज-नर्गिस की नज़दीकी सामने आती हैं! इसी दौर में अपनी 'ब्यूटी क्वीन' मधुबाला की 'मि. एंड मिसेस ५५' की छाता लेकर "ठंडी हवा काली घटा आ ही गयी झुमके.." गाती हसती छवि प्यारी लगती हैं! वैसे 'काला बाज़ार' (१९६०) फिल्म में भी देव आनंद और वहिदा रहमान का एक छाते में जाते हुए, पृष्ठभूमी पर सुनायी देता गाना "रिमझिम के तरानें लेके आयी बरसात.." भी रूमानी अहसास का था!
'उसने कहा था' (१९६०) के "मचलती आरजू.." गाने मे नंदा का झुलना!
"दिल तेरा दीवाना.." (१९६२) गाने में शम्मी कपूर और माला सिन्हा.
पेड़ के झूलों पर झूलना भी सावन में गाँव की लड़कियों का एक खेल होता हैं! 'उसने कहा था' (१९६०) फिल्म मे नंदा का "मचलती आरजू.." गाकर झूले में झुलना और..इसमें ही सुनिल दत्त का उसके साथ "आ हा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिये.." ऐसा प्यार जताना भी लुभावना था! तो दूसरी तरफ़ रिबेल स्टार शम्मी कपूर ने धुव्वाधार बारीश में ख़ूबसूरत माला सिन्हा के साथ "दिल तेरा दीवाना.." (१९६२) ऐसा इश्क़ करते हुए कोई कसर नहीं छोडी! बाद में फिल्म 'हमजोली' (१९७०) में "हाय रे हाय.." गातें बारीश में नाचते जंपिंग जैक जितेंद्र और शोख़ हसीन लीना चंदावरकर की अदाएँ भी ऐसी ही थी!
'मिलन' (१९६७) के "सावन का महिना.." गाने मे नूतन और सुनिल दत्त.

सावन के कुछ तरल फिल्म प्रसंग तथा गाने भी हैं..जैसे की 'मिलन' (१९६७) का, जिसके "सावन का महिना पवन करे शोर.." गाने में नूतन को "शोर नहीं सोर" ऐसा समझाता हुआ सुनिल दत्त का भोलाभाला देहाती!..और फिल्म 'अंजाना' (१९६९) के "रिमझिम के गीत सावन गाएं.." में जुबली स्टार राजेंद्र कुमार और ख़ूबसूरत बबीता का भावुक होना! इसी दौरान पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना का अनोखा अंदाज़ था..फिल्म 'दो रास्तें' के "छुप गएँ सारें नज़ारें ओए क्या बात हो गई.." ऐसा नटखट मुमताज़ के साथ व्यक्त होने का! उसके बाद का सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने तो फिल्म 'मंज़िल' (१९७९) के "रिम झिम गिरें सावन.." गाने में मौशमी चटर्जी के साथ बम्बई के बारीश में भीग कर खूब मस्ती की थी!
'दो रास्तें' (१९६९) के "छुप गएँ सारें नज़ारें.." गाने में राजेश खन्ना और मुमताज़.


फिर 'राजश्री प्रोडक्शन' की सीधी सरल फिल्म 'सावन को आने दो' (१९७९) से..'यशराज फिल्म्स' की 'दिल तो पागल हैं' (१९९७) के "ओ सावन राजा कहाँ से आये तुम..चक दुम दुम.." ऐसे गाने में शाहरुख़ खान और माधुरी दीक्षित के आज के डांस तक..सावन के रूमानीपन को अपने सिनेमा ने दर्शाया..और जारी रखा!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Thursday, 9 August 2018

भारत और म्यांमार का फ्रेंडशिप ब्रिज शुरू होने की ख़बर देखते ही मुझे यह पुराना गाना याद आया..

'पतंगा' (१९४९) के "मेरे पिया गए रंगून" 
गाने में निगार सुलताना!
"मेरे पिया गए रंगून..किया है वहाँ से टेलीफून..
तुम्हारी याद सताती हैं..जिया में आग लगाती हैं.."
'पतंगा' (१९४९) के "मेरे पिया गए रंगून." गाने में गोप और नृत्य कलाकार!

म्यांमार-इंडिया फ्रेंडशिप का खुला गेट!
१९४९ की एच. एस. रवैल की फ़िल्म 'पतंगा' का यह गाना..लिखा था राजेंद्र कृष्ण ने और शमशाद बेग़म के साथ ख़ुद संगीतकार सी. रामचंद्र ने गाया था! विनोदी कलाकार गोप और फ़िल्म की नायिका निगार सुलताना पर यह फ़िल्माया गया था! (हालांकि इसके नायक थे श्याम!) यह गाना तब बड़ा हिट हुआ और अब भी लोकप्रिय हैं!

म्यांमार पहले ब्रह्मदेश हुआ करता था और उसका सबसे बड़ा शहर यांगून उसकी राजधानी थी..जिसका पहले नाम था रंगून! अब बर्मी नाम हुएं हैं!

 इंडो-म्यांमार फ्रेंडशिप को शुभकामनाएँ!!

 - मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Tuesday, 7 August 2018

सालगिरह संपन्न हुए..भारत के जानेमाने कला निर्देशक एवं निर्माता नितिन देसाई जी को बधाई!


(उनके 'एनडी स्टुडिओ' में 'अशोका' टीव्ही सीरियल के सेट पर हुई थी अच्छी मुलाक़ात!)


- मनोज कुलकर्णी
('चित्रसृष्टी', पुणे)

Monday, 6 August 2018

'नमक हराम' (१९७३) में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन!
'फ्रैंडशिप डे' खास लेख:

महफ़िल-ए-याराँ..!


- मनोज कुलकर्णी 


"दिये जलतें हैं...फुल खिलतें हैं... 
बड़ी मुश्क़िल से मगर...
दुनियाँ मे दोस्त मिलतें हैं.."


भारतीय सिनेमा के दो सुपरस्टार्स राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने एक साथ बख़ूबी साकार किया 'नमक हराम' (१९७३) फ़िल्म का यह गाना!..हृषिकेश मुख़र्जी की यह फिल्म वसंत कानेटकर जी ने लिखे 'बेईमान' नाटक पर आधारीत थी!..'फ्रैंडशिप डे' पर इसकी ख़ास याद आयी!
'शेजारी' (१९४१) में केशवराव दाते और गजानन जहागिरदार!


इस गाने में कहीं भी अभिनय में कौन हावी होता है ऐसी स्पर्धा इन दोनों में नज़र नहीं आती और ना ही इनके चाहनेवालों ने यह देखने की कोशिश की..क्यूँ कि यह ज़ज्बा ही ऐसा है की "दोस्त"लफ्ज़ आते ही सिर्फ़ प्यार देखा जाता हैं!
'दोस्ती' (१९६४) में सुशिल कुमार और सुधीर कुमार!

दोस्ती के ऐसे गहरे रंग हमारे भारतीय सिनेमा में हमेशा दिखाई दिए..इसमें सर्वश्रेष्ठ रही 'प्रभात फिल्म कंपनी' की मराठी 'शेजारी' (१९४१)..व्ही. शांताराम निर्देशित यह फिल्म दो बुज़ुर्ग हिन्दु-मुसलमान पड़ौसीयों के इर्द-गिर्द घूमती हैं..जिसमे उभर कर आता है प्यार ही!..इसमें केशवराव दाते और गजानन जहागिरदार ने ये क़िरदार अपने समर्थ अभिनय से हृदय साकार किएं थे! वैसे भारत-पाकिस्तान इन पड़ौसियों का यह रूपकात्मक चित्र था! हिन्दु-मुस्लिम एकता को उजाग़र करनेवाली यह फ़िल्म हिंदी में 'पड़ौसी' नाम से बनी..जिसमे  मुसलमान मिर्ज़ा का किरदार जहागिरदार जी ने ही किया था और हिन्दु ठाकुर की भूमिका की थी मज़हर ख़ान ने..ऐसे प्रयोग करना यह 'प्रभात' की ख़ासियत थी!


'संगम' (१९६४) में राज कपूर, वैजयंतीमाला और राजेंद्र कुमार!
बाद में १९६४ में ताराचंद बड़जात्या जी ने बनायी 'राजश्री प्रोडक्शन' की फिल्म 'दोस्ती' भी इस ज़ज्बा को श्रेष्ठतम आयाम दे गयी! बंगाली कथा पर आधारीत सत्येन बोस निर्देशित इस फिल्म मे 'राजश्री प्रोडक्शन' की परंपरा के अनुसार नए चहरे ही लिएं गए थे..सुशिल कुमार (बेलानी) और सुधीर कुमार (सावंत)..जिन्होंने अंध और अपाहीच दोस्तों की भूमिकाएं बड़ी हृदयद्रावक तरीके से निभाई थी इस सुपरहिट फ़िल्म के लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत में रफ़ी जी ने गाएं "चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे.." ऐसे गाने ख़ूब सराहें गएँ! छह 'फ़िल्मफ़ेअर' पुरस्कारों के साथ यह फिल्म तब 'मॉस्को इंटरनेशनल फिल्म समारोह' में शामिल हुई थी!
'ज़ंज़ीर' (१९७३) के "यारी हैं ईमान मेरा.." में प्राण और अमिताभ बच्चन।

इसी दौरान दो दोस्त और एक प्रेमिका ऐसा प्रेम त्रिकोण हिंदी सिनेमा में शुरू हुआ! हॉलीवुड की क्लासिक फ़िल्म 'गॉन विथ द विंड' (१९३९) से प्रेरित 'आर.के.' की पहली रंगीन फ़िल्म 'संगम' (१९६४) में निर्देशक राज कपूर ही राजेंद्र कुमार और वैजयंतीमाला के साथ ऐसी उलझी भूमिका में आए! दोस्त और प्रेमिका ने बेवफ़ाई की इस ग़लतफ़हमी में "दोस्त दोस्त ना रहां.." गानेवाला उसका किरदार उलझा नज़र आया! यह सफल फिल्म रूस में भी प्रदर्शित हुई! इस से रोमैंटिक ट्रैंगल की फ़िल्मे ज्यादातर बॉलीवुड में बनने लगी!
दोस्त' (१९७४) में धर्मेंद्र और शत्रुघ्न सिन्हा!

आगे अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार बनानेवाली प्रकाश मेहरा की फ़िल्म 'ज़ंज़ीर' (१९७३) मे मुल्ज़िम का दोस्ती से अच्छे दिलेर इंसान में हुआ परिवर्तन नज़र आता हैं! इसका प्राण का "यारी हैं ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी.." गाकर अमिताभ पर प्यार लुटाना दिलेर था! बाद में अमिताभ के साथ सहनायकों का 'याराना' भी खूब रहां..जैसे की  रमेश सिप्पी की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'शोले' (१९७५) में धर्मेंद्र का "ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे.." कहकर देमार-मिश्किल साथ, 'हेरा फेरी' (१९७६), 'परवरीश' (१९७७) में विनोद खन्ना का और "बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा..सलामत रहें दोस्ताना हमारा.." का शत्रुघ्न सिन्हा का जिसने पहले धर्मेंद्र के साथ 'दोस्त' (१९७४) में भी अभिनय की टक्कर देने वाला ऐसा 'दोस्ताना' निभाया था!

फ्रेंच फिल्म 'जूल्स एंड जिम' (१९६१) में ज्याँ मोरु, ऑस्कर वर्नर और हेनरी सर्रे!
कुछ युरोपियन फिल्मों में भी दोस्ती को तरलता से दर्शाया हैं! इसमें उल्लेखनीय है 'फ्रेंच न्यू वेव' के फ्रांस्वा त्रुफो की 'जूल्स एंड जिम' (१९६१)..जो एक लव ट्रैंगल थी और इसमें दो दोस्तों का प्यार एक ही से रहता हैं..जो भूमिका की थी दिग्गज फ्रेंच अभिनेत्री ज्याँ मोरु ने जो हाल ही में गुजर गयी!..इसके बाद कहाँ जाएं तो इटालियन फिल्म 'सिनेमा पेरेडिसो' (१९८८)..जो दर्शाती हैं की दोस्ती की कोई उम्र नहीं होती..जिउसेप्प टोरनेटोर की इस फिल्म मे सिनेमा से बहोत लगाववाले लड़के की थिएटर के बुज़ुर्ग फिल्म ऑपरेटर से रही दोस्ती दिखायी है! इस ने 'ऑस्कर' का 'सर्वोत्कृष्ट विदेशी फिल्म' का पुरस्कार पाया था!
इटालियन फिल्म 'सिनेमा पेरेडिसो' (१९८८) में फिलिप्पे नोइरेट और मार्को लिओनार्दी!


१९८० के दशक में आधुनिक बॉलीवुड ने ये दर्शाया की लड़का और लड़की में प्रेम के आगे भी दोस्ती का एक साफ, अच्छा और जज़्बाती रिश्ता होता हैं! इसकी एक अच्छी मिसाल थी डिंपल कपाड़िया की परदे पर पुनरागमन करने वाली फिल्म 'साग़र' (१९८५) जिसमे उसका प्यार होता है ऋषि कपूर पर और ग़हरी दोस्ती रहती हैं कमल हसन से..जिसे इसके लिए 'फ़िल्मफ़ेअर' बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला था जो हिंदी सिनेमा में उसका एकमात्र रहा! 'सागर' भारत की तरफ से 'ऑस्कर' के लिए भेजी गयी थी! फिर एक दशक बाद आयी यश चोपड़ा की रूमानी फ़िल्म 'दिल तो पागल हैं' ( १९९७) में भी कुछ ऐसा ही हैं..करिश्मा कपूर की शाहरुख़ खान के साथ की दोस्ती माधुरी दीक्षित उसका प्यार होने से टूटती नही!
'साग़र' (१९८५) में  डिंपल कपाड़िया और कमल हसन!


हॉलीवुड रोमैंटिक म्यूजिकल 'ग्रीज़ २' (१९८२) का "बैक टू स्कूल..'' गाने का दृश्य!
कॉलेज लाइफ पर हॉलीवुड से फ़िल्में बनती आयी हैं..इसमें पैत्रिसिआ बिर्च की "बैक टू स्कूल..'' जैसे रॉकिंग गानों से हिट रोमैंटिक म्यूजिकल 'ग्रीज़ २' (१९८२) ने यह शुरू किया! बॉलीवुड में भी यह जारी रहा २०१२ में आयी करन जोहर की यूथफुल फ़िल्म 'स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर' से..जिससे आलिया भट्ट जैसी प्रेटी टैलेंटेड षोडशा आयी! यह हवा मराठी सिनेमा को भी लगी और 'दुनियादारी' (२०१३) जैसी फ़िल्में इसमें भी बनती रहीं हैं!

दोस्ती का यह कारवाँ सिनेमा में ऐसा ही चलता रहें!

जश्न-ए-बहारा..महफ़िल-ए-याराँ..आबाद रहें!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]




Saturday, 4 August 2018

'इफ्फी' में विशाल भारद्धाज के साथ मैं!
"बीड़ी जलाई ले, जिगर से पिया
जिगर मा बड़ी आग है.."

इस तरह के गुलजारजी के गाने अपनी '('ओंकारा' जैसी) फिल्मों में बख़ूबी चलानेवाले संगीतकार-फ़िल्मकार विशाल भारद्धाज वाकई में ऐसे हरफ़नमौला है!
गुलज़ारजी के साथ विशाल भारद्धाज!


गुलज़ारजी की फिल्म 'माचिस' (१९९६) से संगीतकार की हैसियत से विशाल भारद्धाज का उनसे साथ रहा है..जो फिर खुद फ़िल्मकार बनने के बाद उनके गीत अपने फिल्मों में लेकर उसने बरक़रार रखा!
'ओंकारा' (२००६) का "बीड़ी जलाई ले.." पेश करती बिपाशा बासु!
'हैदर' (२०१४) के "बिस्मिल बिस्मिल.." गाने मेँ शाहीद कपूर!

शेक्स्पीरियन ट्राइलॉजी की उसकी ('मक़बूल'/२००३ और ''ओंकारा'/२००६ के बाद) तीसरी फिल्म 'हैदर' (२०१४) के "बिस्मिल बिस्मिल.." इस मशहूर गाने से वह जारी है..!


मैं इन दोनों को अकसर फिल्म फेस्टिवल्स और संबंधित कार्यक्रमों में मिलता आ रहा हूँ!




आज विशाल भारद्धाज का जनमदिन है..
उसे मुबारकबाद!!


- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Friday, 3 August 2018

मशहूर शायर शकील बदायुनी.
"ए मोहब्बत तेरे अंजाम पर रोना आया..
जाने क्यूँ आज तेरे नाम पर रोना आया!"


ऐसी रूमानी ग़ज़ल हो, या गीत..
 
"एक शहेनशाह ने बनवा के हसीन ताज़महल..
सारी दुनियाँ को मोहब्बत की निशानी दी है.." 


ऐसा रूमानी लिखनेवाले..मशहूर शायर शकील बदायुनी जी को उनके १०२ वे जनमदिन पर सुमनांजली!

"एक शहेनशाह ने..
बनवा के हसीन ताज़महल.." 
शक़ील बदायुनी जी का यह रूमानी गीत नौशाद जी ने संगीतबद्ध किया। मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर ने गाया और अभिनय सम्राट दिलीप कुमार ने ख़ूबसूरत वैजयंतीमाला के साथ 'लीडर' (१९६४) में साकार किया!

- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी, पुणे]