Monday, 12 June 2023

हुस्न-ओ-इश्क़ के दरमियान इज़हार-ए-मोहब्बत का..
गुलाब ही है कुदरत ने दिया हुआ सबसे हसीन ज़रिया.!

- मनोज 'मानस रूमानी'

('रेड रोज डे' पर!)

Friday, 9 June 2023

याद सूफी कवि अमीर ख़ुसरो जी की!

"जिहाल-ए-मिस्किन
मकुन ब-रंजिश.."

यह नग़्मा अब नए अंदाज़ में विशाल मिश्रा और श्रेया घोषाल ने गाएं म्यूज़िक वीडियो में सुनाई दिया!

सुनकर अच्छा लगा और याद आयी इस के मूल सूफियाना कवि अमीर ख़ुसरो जी की! उनकी "ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, दुराये नैना बनाये बतियां" यह मूल नज़्म मशहूर हैं।

हालांकि, तीन दशक से भी पहले गुलज़ार जी ने इस पर लिखा गीत जे. पी. दत्ता जी की फ़िल्म 'गुलामी' (१९८५) में लिया गया था। इसे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी के संगीत में शब्बीर कुमार और लता मंगेशकर जी ने गाया था। यह काफी लोकप्रिय हुआ था!
[वैसे गुलज़ार जी का फ़िल्म 'मौसम' (१९७५) का गीत "दिल ढूँढता है फिर वही.." भी मिर्ज़ा ग़ालिब जी के "जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन" शेर से ही प्रेरित था!]

ख़ैर, चौदहवीं सदी के ख़ुसरो जी का सूफियाना असर अब भी बरक़रार हैं!
कश्मीर की ख़ूबसूरती पर उनका यह फ़ारसी उद्धरण आज भी उस सरज़मी की जैसे पहचान बन गया हैं..
"अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त...
हमीं अस्त-ओ हमीं अस्त-ओ हमीं अस्त!"


ऐसे अमीर ख़ुसरो साहब को सलाम!!

- मनोज कुलकर्णी

Wednesday, 31 May 2023


"सीने में सुलगते हैं अरमां..."

प्रेम धवन जी का लिखा और तलत महमूद जी तथा लता मगेशकर जी ने गाया यह दर्दभरा 'तराना' आज फिर से मन में गूंजा..

इसके प्रतिभासंपन्न संगीतकार अनिल बिस्वास जी को २० वे स्मृतिदिन पर याद करते हुए!

उन्हें सुमनांजलि!!

- मनोज कुलकर्णी

Saturday, 27 May 2023

सुनहरा पल बिताया था हमने वहां कभी शान से
सम्मुख जो थे अपने प्रजातंत्र की शान संसद के!

- मनोज 'मानस रूमानी'

[वर्तमान परिदृश्य के मद्देनज़र, तीस साल से भी पुराना सुनहरा पल याद आया..हमारे 'बी.सी.जे.' स्टडी टूर के दरमियान नई दिल्ली में हमारी पार्लियामेंट विज़िट का!]

(छायाचित्र में मैं बीच में क्लासमेट्स के साथ हूँ!)

- मनोज  कुलकर्णी

बधाई हो!

कर्नाटक में 'कांग्रेस' की हुई बड़ी जीत!
दक्षिण भारत में 'बीजेपी' हुई क्या लुप्त?


- मनोज 'मानस रूमानी'

Monday, 8 May 2023

'शिरडी के साईबाबा' का प्रभाव!

'शिरडी के साईबाबा' (१९७७) फ़िल्म का (कुछ अस्पष्ट) समयोचित छायाचित्र!

अब के हालातों के मद्देनज़र दोनों समाजों में सौहार्द बरक़रार रखनेवाले शिरडी के साईबाबा की अहमियत उभर आई हैं! सर्व धर्म समभाव के प्रतिक समझे गए उनकी महिमा को उजागर करनेवाली दो कामयाब फ़िल्मे इस वक़्त याद आयी।

उसमें पहली थी मराठी.. 'शिरडी चे साईबाबा' (१९५५) जो निर्देशित की थी कुमार - सेन समर्थ जी ने और इसमें दत्तोपंत आंग्रे जी ने बाबा की प्रमुख भूमिका स्वाभाविकता से निभाई थी। इसकी पटकथा तथा संवाद कुमारसेन जी ने पांडुरंग दीक्षित जी के साथ लिखे थे, जिन्होंने इसका संगीत भी किया था। संत कबीर और एकनाथ जी की पद्यरचनाएँ इसमें थी। अपने जानेमाने मोहम्मद रफ़ी जी ने इसमें आवाज़ दी थी! इस फ़िल्म को लोकप्रियता के साथ राष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुआ!

दूसरी थी हिंदी फ़िल्म 'शिरडी के साईबाबा' (१९७७) जिसका निर्माण अपने आदर्श 'भारतकुमार' फेम मनोज कुमार जी ने किया था। ("बाबा ने ही यह फ़िल्म मुझसे बनवाई!" ऐसा उन्होंने मुझे एक मुलाकात में भावुक होते कहा था!) उन्होंने इसकी पटकथा लिखी थी और इसमें सूत्रधार भक्त की भूमिका भी की। हिंदी सिनेमा के नामचीन कलाकारों ने इसमें समर्पित भाव से अपनी शिरकत की थी! अशोक भूषण जी ने इसका निर्देशन किया था और इसमें बाबा की प्रमुख भूमिका सुधीर दलवी जी ने लाजवाब निभाई थी! मराठी फ़िल्म से जाने गए पांडुरंग दीक्षित जी ने इस फ़िल्म को भी संगीत दिया। इसमें रफ़ी साहब के धार्मिक सौहार्दता से भरे गानें दिल को छू गए। यह फ़िल्म पहले से बहुत कामयाब रही और इससे उनकी महिमा का बड़ा प्रभाव समाज पर पड़ा!

इन फ़िल्मों के बाद उनका प्रभाव और भी कुछ फ़िल्मों में दिखाई दिया। जैसे की जानेमाने सेक्युलर फ़िल्मकार मनमोहन देसाई जी की फ़िल्म 'अमर अकबर अन्थोनी' (१९७७) में उनपर फ़िल्माया गीत "शिरडी वाले साई बाबा.." जो रफ़ी साहब ने ही गाया था और ऋषि कपूर जी ने बख़ूबी सादर किया था। इसकी दो पंक्तियाँ अब के हालातों पर समर्पक हैं..
"ये ग़म की रातें..रातें ये काली..
इनको बना दे ईद और दीवाली.!"


ख़ैर, सर्व धर्म समभाव की प्रेरणास्रोत की दृष्टी से इसे देख सकतें हैं!!


- मनोज कुलकर्णी

Wednesday, 3 May 2023

ज़र्द-सहाफ़त के इस खुशामदी दौर में 👏
चल रहीं हैं आज़ाद क़लम मुश्किल से 🤔

- मनोज 'मानस रूमानी'✍️

['विश्व प्रेस आजादी दिवस' पर!]


(ज़र्द-सहाफ़त = सनसनीखे़ज़ पत्रकारिता!)