Wednesday, 5 May 2021

नशा हो ख़ूबसूरत आँखों से!

 

जाम के पीछे जा रहें दीवानें टीवी न्यूज़ में देखें थे..और मुझे इससे अलग़ शक्ति सामंता की फ़िल्म..
'अमर प्रेम' (१९७२) का "चिंगारी कोई भड़के.." गाने का यह रूमानी सीन याद आया था!

सुपरस्टार राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर इस हिट जोड़ी का वाकई में अमर प्रेम चित्र।

इसमें मदिराधीन इस हालत में आता है की पूछता है..
 
"मदिरा जो प्यास लगाये..
उसे कौन बुझाये.."

तब तक उसे प्यार करनेवाली ने उसका जाम अपने हाथ में लिया होता है!
 
 
आख़िर में वो उसके कंधे पर सर ऱखकर लेटे उसकी ख़ूबसूरत आँखों में देखता रहता है..
अब उसे मदिरा की नशा की जरुरत नहीं होती!

किसी हसीन चेहरे की आँखों से जो नशा होता है..वह सिर्फ़ इश्क़बाज़ों को ही मालुम!
वैसे इससे जीना अच्छा रूमानी होता है।

- मनोज कुलकर्णी

सिनेमा का दीवानापन या उपयोग!

'जब प्यार किसी से होता है' (१९६१) के "सौ साल पहले.." गाने में देव आनंद और आशा पारेख!

हिंदी की क्लास लग गयी थी..और टीचर ने पिछले बेंच पर गुनगुना रहें स्टूडेंट को खड़े होने के लिए कहाँ..और पूंछा, "भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल का वाक्य में प्रयोग करों!"

शरारती लड़का तुरंत बोला, "सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था..आज भी है..और कल भी रहेगा!"

क्लास में हँसी फ़ैल गयी..और टीचर शरमा गयी!!

- मनोज कुलकर्णी

Tuesday, 4 May 2021



"अक्सर कोई लड़की इस हाल में
किसी लड़के से सोलहवें साल में
जो कहती है वो मुझे कहना है.."

 
..कहकर 'आरके' की रोमैंटिक फिल्म 'बॉबी' (१९७३) में नौजवान ऋषि कपूर से प्यार जतानेवाली ख़ूबसूरत.. डिंपल कपाड़िया वाकई उसी उम्र की थी।

 
'बॉबी' हिट होकर भी डिंपल सूपरस्टार राजेश खन्ना से शादी करके 'आशीर्वाद' में बस गयी!

 
 

 
लेकिन काका राजेश के वलय में दबी डिंपल बारह साल बाद रमेश सिप्पी की रूमानी.. 'सागर' (१९८५) से अपने रुपहले परदे पर दृढ़ता से लौट आयी और वह भी ऋषि कपूर के साथ ही।

अब यहां इश्क़ बयां करने की हद ही दोनों ने तोड़ दी!..और ऐसे किस्स करतें नज़र आएं!
शायद उसका वह रिबेल स्टेप हो!

 
- मनोज कुलकर्णी

'पद्मश्री' सम्मानित..'मदर इंडिया' नर्गिस!


दिग्गज अभिनेत्री नर्गिस दत्त जी को 'पद्मश्री' बहाल करते
अपने भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद!

अपने भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री नर्गिस दत्त जी को 'पद्मश्री' बहाल होने की दुर्लभ तस्वीर यहाँ हैं। १९५८ में अपने भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हाथों उन्हें इस बहुमान से नवाज़ा गया था। यह सम्मान प्राप्त करनेवाली वो पहली अभिनेत्री रही।

महबूब ख़ान की फ़िल्म 'मदर इंडिया' (१९५७) में नर्गिस जी अपने कैरियर की सर्वश्रेष्ठ भूमिका में!
इससे पहले नर्गिस जी का सर्वोच्च अभिनय परदे पर आया था। १९५७ में महबूब ख़ान की फ़िल्म 'मदर इंडिया' में उसने जद्दोजहद भरी ज़िंदगी का अकेली सामना करते हुए बच्चों का पालनपोषण करके उभरने वाली आदर्श स्त्री साकार की। इसे 'सर्वश्रेष्ठ- फीचर फ़िल्म' का राष्ट्रीय- पुरस्कार मिला। इसके साथ अपने भारत की तरफ से.. 'ऑस्कर' अवार्ड के लिए भेजी गई यह पहली फ़िल्म रही।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिराजी गांधी के साथ नर्गिसजी!

 
१९८० में नर्गिस दत्त जी राज्यसभा में सम्मान से आनेवाली पहली अभिनेत्री रही। (यहाँ उनकी अपने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी के साथ तस्वीर भी है।)
 
उनके नाम 'राष्ट्रीय एकात्मता पर सर्वोत्कृष्ट फ़िल्म' का..
'नर्गिस दत्त पुरस्कार' है।

'मदर इंडिया' में अपनी श्रेष्ठ व्यक्तिरेखा द्वारा नर्गिस जी ने.. सशक्त भारतीय नारी की परिभाषा स्थापित की। इसके लिए तो वो 'भारतरत्न' सम्मान की भी हकदर हैं!

 
- मनोज कुलकर्णी

Monday, 3 May 2021

भारतीय सिनेमा: एक्सक्लूजिव्ह!


सरस्वतीबाई फालके का पति के साथ बड़ा योगदान!

अपने भारतीय सिनेमा के पितामह दादासाहब फालके और उनकी पत्नी सरस्वतीबाई!

आज ३ मई..इसी दिन १९१३ में 'राजा हरिश्चंद्र' यह अपनी पहली भारतीय फीचर फ़िल्म दर्शकों के लिए प्रदर्शित हुई।

३ मई,१९१३ को प्रदर्शित 'राजा हरिश्चंद्र' इस अपनी पहली भारतीय फीचर फ़िल्म का दृश्य!
दादासाहब फालके जी ने बड़ी शिद्दत से इसका निर्माण किया था। इस नतीजे पर आने तक के उनके चलचित्र प्रयास पर पहले बहुत लिखा है। लेकिन आम तौर पर एक अहम बात नज़रअंदाज़ की जाती हैं की, इस जद्दोजहद में उनकी पत्नी सरस्वतीबाई जी का योगदान बराबर का रहा!

इस से एक साल पहले अपने कैमरा और निर्मिति प्रक्रिया को जाँचने के लिए फालके जी ने कुछ दृश्यं फिल्माएं, जैसे की बच्चों का खेलना! फिर फीचर फ़िल्म बनाने के लिए फाइनेंसर प्राप्त करने हेतु उन्होंने एक लघु फ़िल्म का प्रयोग किया। इसमें एक पॉट में उन्होंने मटर का बीज लगाया और उसके सामने कैमरा रख कर क़रीब महीने तक रोज उसके उगने की एक फ्रेम वे लेते रहे। और वह शॉर्ट एक्सपेरिमेंटल फ़िल्म बनी, जिसका मराठी शीर्षक था 'अंकुराची वाढ' (ग्रोथ ऑफ ए मटर प्लांट) इसमें सरस्वतीबाई जी ने उनका साथ दिया। फ़िल्म का डेव्हलपिंग और परफोरेटिंग भी दादासाहब ने उन्हें सिखाया था।
 
'राजा हरिश्चंद्र' ( १९१३) फ़िल्म के मनोरम दृश्य में दत्तात्रय दाबके  (हरिश्चंद्र) और अन्ना सालुंके (तारामती)
उसके बाद राजा हरिश्चंद्र के जीवन पर उन्होंने फीचर - फ़िल्म का सोचा, तब उसके लिए बड़ी रकम खड़ी करने के लिए सरस्वतीबाईजी ने अपने गहनें तक बेचें! बग़ैर इसके यह फ़िल्म प्रोडक्शन होता ही नहीं! फिर दादासाहब इस की स्क्रिप्ट राइटिंग में रोज उनसे चर्चा करते थे और वो भी इस प्रक्रिया में योगदान देती थी। बाद में फ़िल्म की कास्टिंग में दादासाहब के सामने बड़ा - प्रश्न था तारामती की भूमिका कौन करेगी; क्योंकि तब कोई स्त्री सिनेमा के लिए काम करे यह संभव नहीं था। इसके लिए भी उन्होंने सरस्वतीबाई जी को पूछा; लेकिन उन्होंने इसे मना किया; क्योंकि उन्हें बाकी जिम्मेदारियाँ संभालनी थी।

'राजा हरिश्चंद्र' (१९१३) फ़िल्म को कैमरामन त्र्यम्बक तेलंग के साथ चित्रित करते दादासाहब फालके!
इसके बाद 'राजा हरिश्चंद्र' के फिल्मांकन दौरान दादासाहब और कैमरामन को उसके - प्लेसिंग और रिफ्लेक्टर आदी में सरस्वतीबाई जी सहकार्य करती थी। साथ ही काम कर रहें सभी लोगों की भोजन और कपड़ों की व्यवस्था वो देखती थी।
फिर पोस्ट प्रोडक्शन में उन्होंने अपना योगदान दिया। इसमें फ़िल्म डेव्हलपिंग और मिक्सिंग के साथ एडिटिंग भी शामिल थी। परफोरेटिंग होकर फ़िल्म प्रोजेक्टर पर जाने तक!

'राजा हरिश्चंद्र' (१९१३) फ़िल्म के अहम दृश्य में अन्ना सालुंके (तारामती), -
दत्तात्रय दाबके (हरिश्चंद्र), भालचंद्र फालके (रोहितश्व) और अन्य कलाकार!

तो इसी तरह दादासाहब - फालके ने बनाई 'राजा - हरिश्चंद्र' यह अपनी पहली भारतीय फीचर फ़िल्म की निर्मिति में उनकी पत्नी.. सरस्वतीबाई जी का अमूल्य योगदान रहा। कहतें ही हैं..
"एक सफल पुरुष के पीछे एक महिला होती है"!

अपने भारतीय सिनेमा क्षेत्र का सर्वोच्च 'दादासाहब फालके - पुरस्कार' उन के नाम को.. समर्पित हैं। सरस्वतीबाई जी के नाम का भी एक पुरस्कार शायद है!

ख़ैर दादासाहब फालके जी को 'भारतरत्न' सम्मान बहाल करना चाहिए यह हम कई सालों से कह/लिख रहे हैं।
अब ऐसा कहा जाए की दादासाहब और सरस्वतीबाई जी संयुक्त रूप से इससे सम्मानित हो!

सरस्वतीबाई जिन्हे तब आदर से "काकी" कहतें थे, उनको और दादासाहब फालके को इस अवसर पर मेरा विनम्र अभिवादन!!
 
- मनोज कुलकर्णी

 
"दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा.."

ऐसी नसीहत देनेवाली अपने भारतीय सिनेमा की..
'मदर इंडिया' नर्गिस जी को यह जहाँ छोड़ कर आज ४० साल हो गएँ।

 
उन्हें सुमनांजलि!!

- मनोज कुलकर्णी

Sunday, 2 May 2021

एक्सक्लुजिव्ह!


जब बेटा पिता को क्लैप देता है!

छोटे रणबीर..पापा मशहूर अभिनेता ऋषि कपूर की फ़िल्म..
'प्रेमग्रंथ' (१९९६) के मुहूर्त समय क्लैप देते हुए!
 
ऊपर क्लैपरबोर्ड हाथ में लिया हुआ है कपूर खानदान का चिराग़ ऱणबीर..अपने पिता मशहूर अभिनेता ऋषि कपूर की 'प्रेमग्रंथ' (१९९६) फ़िल्म के मुहूर्त समय!..२५ साल हो गए इसे!

अपने पिता ऋषि कपूर को वो निर्देशित कर रहे फ़िल्म..
'आ अब लौट चले' (१९९९) के लिए असिस्ट करते रणबीर!
ऋषि जी के छोटे भाई चिंपू याने राजीव कपूर ने 'प्रेमग्रंथ' फ़िल्म निर्देशित की थी जिसमे माधुरी दीक्षित नायिका थी। हूबहू अपने चाचा शम्मी कपूर जैसे दिखनेवाले राजीव ने १९८३ में 'एक जान है हम' फ़िल्म से बतौर नायक परदे पर उसी अंदाज़ में कदम रखा था। (तब मेरी सिने पत्रकारिता की शुरुआत का लेख मैंने इस शम्मीजी की हमशकल पर लिखा था!) बाद में उनके..
'शो मैन' पिता राज कपूर ने (यास्मीन) मंदाकिनी को पेश करते बनायी 'राम तेरी गंगा मैली' (१९८५) इस सफल फ़िल्म के वो नायक थे! बस, आगे उनका एक्टिंग कैरियर इतना क़ामयाब नहीं रहा।

ऋषि कपूर निर्देशित 'आ अब लौट चले' (१९९९) के लिए..
असिस्टंट रहे रणबीर फिल्म की नायिका ऐश्वर्या राय के साथ!
बहरहाल, रणबीर कपूर ने  - अपनी 'एसएससी' होने के बाद ही अपने पापा ऋषि कपूर को वो निर्देशित कर रहे फ़िल्म 'आ अब लौट चले' (१९९९) के लिए असिस्ट किया था। ऋषि जी निर्देशित इस एकमात्र फ़िल्म में नायक और नायिका थे.. (विनोदपुत्र) अक्षय खन्ना और ऐश्वर्या राय! बाद में अमरिका जाकर रणबीर ने बाक़ायदा 'स्कूल ऑफ़ विज़ुअल आर्ट्स' में फिल्म मेकिंग और 'ली- स्ट्रासबर्ग थिएटर एंड फिल्म इंस्टिट्यूट' में मेथड एक्टिंग सिखी।

 
संजय लीला भंसाली की फ़िल्म 'सावरियां' (२००७) में सोनम कपूर और रणबीर कपूर!
 
इंडिया आने के बाद, मशहूर संजय लीला भंसाली को उनकी 'ब्लैक' (२००५) इस अमिताभ बच्चन और रानी मुख़र्जी - अभिनीत बेहतरिन फ़िल्म के लिए रणबीर कपूर असिस्टेंट डायरेक्टर रहे। तब उसके साथ (अनिल पुत्री) सोनम कपूर भी वहां काम करती थी। बाद में रणबीर और सोनम को बतौर नायक और नायिका के रूप में भंसाली ने अपनी अगली फ़िल्म 'सावरियां' (२००७) में पेश किया!

 
 
इस साल राजीव कपूर जी का निधन हुआ और परसो साल हुआ ऋषि कपूर जी यह जहाँ छोड़ कर!

अब अच्छे अभिनेता के तौर पर उभर आएं रणबीर कपूर आगे अपने फ़िल्म कैरियर में बहोत तरक़्क़ी करे!

- मनोज कुलकर्णी