मेरे इस ब्लॉग पर हमारे भारतीय तथा पूरे विश्व सिनेमा की गतिविधियों पर मैं हिंदी में लिख रहा हूँ! इसमें फ़िल्मी हस्तियों पर मेरे लेख तथा नई फिल्मों की समीक्षाएं भी शामिल है! - मनोज कुलकर्णी (पुणे).
Saturday, 29 July 2023
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला..
तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला..s"
दिल को छूने वाली आवाज़ के मुकेश जी ने गाएं यथार्थवादी गीतों में से मेरा यह एक पसंदीदा गीत..हाल ही में शुरू हुई उनकी जन्मशताब्दी पर मन मे गूँजा!
विश्व विख्यात कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर जी के मूल "जोदी तोर डाक सुने केउ ना आसे तोबे एकला चलो रे..s" इस मशहूर बंगाली गीत से प्रेरित कवि प्रदीप जी का यह गीत!
हमेशा उदास मन को जीवनपथ पर चलने की प्रेरणा देता हैं!
मुकेश साहब को इसी से याद करके सुमनांजलि!!
- मनोज कुलकर्णी
Thursday, 6 July 2023
Sunday, 25 June 2023
वह नफ़ासत, नज़ाकत..शायराना इज़हार-ए-इश्क़..
हमेशा से ही रहा हैं मेरा..तसव्वुर-ए-शायराना इश्क़!
- मनोज 'मानस रूमानी'
[इसी अंदाज़ की एच.एस. रवैल जी की 'मेरे महबूब' (१९६३) इस मेरी पसंदीदा फ़िल्म की ६० वी वर्षगांठ पर यह लिखा हैं। इसमें जुबिली स्टार राजेंद्र कुमार और ख़ूबसूरत साधना ने नज़ाक़त से शायराना इश्क़ साकार किया हैं। शकील बदायुनी जी की लाजवाब शायरी नौशाद जी के संगीत में मेरे अज़ीज़ मोहम्मद रफ़ी जी तथा लता मंगेशकर जी ने गायी हैं! यह शायराना अंदाज़-ए-इश्क़ मुझे हमेशा लुभाता रहां हैं!]
- मनोज कुलकर्णी
Monday, 12 June 2023
Friday, 9 June 2023
याद सूफी कवि अमीर ख़ुसरो जी की!
"जिहाल-ए-मिस्किन मकुन ब-रंजिश.."
यह नग़्मा अब नए अंदाज़ में विशाल मिश्रा और श्रेया घोषाल ने गाएं म्यूज़िक वीडियो में सुनाई दिया!
सुनकर अच्छा लगा और याद आयी इस के मूल सूफियाना कवि अमीर ख़ुसरो जी की! उनकी "ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, दुराये नैना बनाये बतियां" यह मूल नज़्म मशहूर हैं।
हालांकि, तीन दशक से भी पहले गुलज़ार जी ने इस पर लिखा गीत जे. पी. दत्ता जी की फ़िल्म 'गुलामी' (१९८५) में लिया गया था। इसे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी के संगीत में शब्बीर कुमार और लता मंगेशकर जी ने गाया था। यह काफी लोकप्रिय हुआ था!
[वैसे गुलज़ार जी का फ़िल्म 'मौसम' (१९७५) का गीत "दिल ढूँढता है फिर वही.." भी मिर्ज़ा ग़ालिब जी के "जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन" शेर से ही प्रेरित था!]
ख़ैर, चौदहवीं सदी के ख़ुसरो जी का सूफियाना असर अब भी बरक़रार हैं!
कश्मीर की ख़ूबसूरती पर उनका यह फ़ारसी उद्धरण आज भी उस सरज़मी की जैसे पहचान बन गया हैं..
"अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त...
हमीं अस्त-ओ हमीं अस्त-ओ हमीं अस्त!"
ऐसे अमीर ख़ुसरो साहब को सलाम!!
- मनोज कुलकर्णी





